CJP Protest : सादे कपड़ों में तैनात हो सकती है पुलिस?

टीशर्ट, जींस, हाथ में लाठी और चेहरे पर कोई पहचान नहीं — क्या ये असली
पुलिसकर्मी थे या कुछ और?

जंतर-मंतर पर CJP प्रोटेस्ट के दौरान जब भीड़ पर लाठियां बरसीं, तो कैमरों ने
कुछ ऐसे चेहरे भी कैद कर लिए जिन्होंने वर्दी नहीं पहनी थी। सोशल मीडिया पर
वायरल हुई इन तस्वीरों ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है — क्या कानून सादे
कपड़ों में पुलिस तैनाती की इजाजत देता है, या फिर यह किसी गंभीर चूक और
जवाबदेही से बचने की कोशिश है? जवाब उतना सीधा नहीं जितना लगता है। पूरी सच्चाई
जानने के लिए पढ़ें यह विस्तृत रिपोर्ट।

CJP प्रोटेस्ट जंतर मंतर सादे कपड़ों में लाठीधारी पुलिस वायरल तस्वीर

क्या हुआ था जंतर-मंतर पर?

20 जुलाई 2026 को कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के बैनर तले हजारों प्रदर्शनकारी
जंतर-मंतर से संसद भवन की ओर मार्च करने निकले थे। यह प्रदर्शन NEET पेपर लीक,
परीक्षा प्रणाली में गड़बड़ियों और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे
की मांग को लेकर आयोजित किया गया था। पुलिस ने संसद की ओर बढ़ रही भीड़ को
रोकने के लिए पहले आंसू गैस के गोले छोड़े और फिर लाठीचार्ज किया। इस दौरान कई
प्रदर्शनकारी घायल हुए, जिनमें कुछ छात्रों ने आरोप लगाया कि उन्हें कीलों वाली
लाठियों से पीटा गया।

इसी झड़प के दौरान बनी कुछ तस्वीरों और वीडियो में सिविल ड्रेस पहने कुछ लोग
प्रदर्शनकारियों पर डंडे चलाते हुए दिखे। इनमें से दो लोगों की पहचान सोशल
मीडिया यूजर्स ने हनी डागर और यश कनावत के रूप में की और दावा किया कि ये
दिल्ली पुलिस के ही जवान हैं, जो भीड़ नियंत्रण के दौरान सादी वर्दी में ड्यूटी
पर तैनात रहते हैं। हालांकि इस बारे में दिल्ली पुलिस की ओर से शुरुआत में कोई
आधिकारिक स्पष्टीकरण नहीं आया, जिससे विवाद और गहरा गया।

सिविल ड्रेस पुलिसकर्मी लाठी चलाते हुए जंतर मंतर वीडियो स्क्रीनशॉट


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क्या कानून सादे कपड़ों में पुलिस तैनाती की इजाजत देता है?

यह सवाल सुनने में जितना सीधा लगता है, इसका जवाब उतना ही परतदार है। संविधान
या किसी एक कानून में सीधे-सीधे यह नहीं लिखा कि पुलिसकर्मी हमेशा वर्दी में ही
ड्यूटी करेगा या कभी सादे कपड़ों में नहीं आ सकता। लेकिन पुलिस मैनुअल और
स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) के मुताबिक, आम ड्यूटी पर तैनात हर
पुलिसकर्मी के लिए वर्दी पहनना अनिवार्य माना जाता है। सादे कपड़ों में काम
करने की छूट सिर्फ खास मामलों में दी जाती है — जैसे क्राइम ब्रांच, CID या
खुफिया एजेंसियों की टीमें, जो निगरानी, मुखबिरी जुटाने या गुप्त ऑपरेशन के लिए
सिविल ड्रेस में तैनात होती हैं।

भीड़ नियंत्रण, प्रदर्शन प्रबंधन और लाठीचार्ज जैसी कार्रवाई पूरी तरह
वर्दीधारी बल का काम माना जाता है, क्योंकि इसमें बल प्रयोग सीधे नागरिकों पर
होता है और जवाबदेही तय करने के लिए पहचान जरूरी होती है। यही वजह है कि अगर
सादे कपड़ों में कोई व्यक्ति भीड़ में डंडा चलाता दिखे, तो सवाल उठना स्वाभाविक
है कि वह वाकई पुलिसकर्मी है या नहीं, और अगर है तो उसकी तैनाती किस अधिकार के
तहत हुई।

BNSS और कानूनी प्रावधान क्या कहते हैं?

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के अध्याय 11 में धारा 148 से 160 तक
कानून-व्यवस्था बनाए रखने और भीड़ को तितर-बितर करने से जुड़े पुलिस के अधिकार
दर्ज हैं। इसके अलावा जंतर-मंतर जैसे संवेदनशील इलाकों में प्रदर्शन से पहले
प्रशासन अक्सर BNSS की धारा 163 (जो पुरानी CrPC धारा 144 का नया रूप है) लागू
कर देता है। इस धारा के तहत जिला मजिस्ट्रेट या पुलिस आयुक्त किसी क्षेत्र में
भीड़ जमा होने, हथियार ले जाने या जुलूस निकालने पर अस्थायी रोक लगा सकते हैं।

लेकिन इनमें से कोई भी प्रावधान यह नहीं कहता कि बल प्रयोग करने वाला
पुलिसकर्मी सादे कपड़ों में हो सकता है। बल्कि आम कानूनी सिद्धांत यही कहता है
कि किसी भी नागरिक पर बल प्रयोग करने से पहले पुलिस को अपनी पहचान स्पष्ट करनी
चाहिए, चेतावनी देनी चाहिए और सिर्फ जरूरत के अनुसार ही न्यूनतम बल इस्तेमाल
करना चाहिए। सादे कपड़ों में अचानक डंडे चलाना इसी प्रक्रिया के उल्लंघन जैसा
माना जाता है।


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कोर्ट का क्या कहना है — पहचान छिपाकर बल प्रयोग पर सवाल

यह मुद्दा पहली बार सामने नहीं आया है। इससे पहले आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट में
एक याचिका पर सुनवाई के दौरान यह सवाल उठा था कि अगर पुलिसकर्मी सादे कपड़ों
में ड्यूटी कर रहे हों, तो आम नागरिक उन्हें असली पुलिस अधिकारी के तौर पर कैसे
पहचानें। यह मामला एक विधायक से जुड़ा था, जिन पर ड्यूटी पर तैनात पुलिस
अधिकारी के काम में बाधा डालने का आरोप लगा था। अदालत की यह टिप्पणी बताती है
कि पहचान छिपाकर की गई पुलिसिंग हमेशा कानूनी सवालों के घेरे में रहती है,
खासकर जब बात बल प्रयोग की हो।

पुलिस बल की जवाबदेही का पूरा ढांचा इसी बात पर टिका है कि हर अधिकारी की पहचान
— नाम, बैज नंबर, पद — स्पष्ट रूप से दिखनी चाहिए, ताकि अगर कोई गलत तरीके से
बल प्रयोग करे तो उसकी जिम्मेदारी तय की जा सके। जब यह पहचान गायब हो जाती है,
तो जवाबदेही की पूरी व्यवस्था कमजोर पड़ जाती है।

दिल्ली पुलिस मुख्यालय की सफाई और नया फरमान

सोशल मीडिया पर उठे सवालों और आलोचना के बाद दिल्ली पुलिस मुख्यालय को बैकफुट
पर आना पड़ा। 22 जुलाई को मुख्यालय की ओर से सभी संबंधित यूनिट्स को स्पष्ट
निर्देश जारी किया गया कि प्रदर्शन स्थल पर तैनात हर अधिकारी और जवान को
कानून-व्यवस्था ड्यूटी के दौरान पूरी और सही वर्दी पहननी अनिवार्य होगी। यह
निर्देश साफ तौर पर मानता है कि प्रदर्शन नियंत्रण में सिविल ड्रेस की मौजूदगी
असामान्य और आपत्तिजनक थी, भले ही मुख्यालय ने इसे सीधे तौर पर गलती न कहा हो।

वहीं विपक्षी नेताओं ने भी इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया। संसद में विपक्ष के
नेताओं ने सरकार से सवाल किया कि आंसू गैस और लाठीचार्ज की नौबत क्यों आई, और
सिविल कपड़ों में किसी को भी नागरिकों पर लाठी चलाने की इजाजत क्यों दी गई। कुछ
नेताओं ने यह भी दावा किया कि प्रदर्शन के दौरान महिला प्रदर्शनकारियों के साथ
अभद्रता भी हुई, जिसकी अलग से जांच की मांग उठी है।

दिल्ली पुलिस मुख्यालय वर्दी अनिवार्य आदेश जंतर मंतर प्रदर्शन

सादे कपड़ों में पुलिस तैनाती से जुड़े जोखिम क्यों गंभीर हैं?

इस पूरे विवाद को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि सिविल ड्रेस में पुलिस
तैनाती केवल एक प्रोटोकॉल का मसला नहीं है, बल्कि इसके कई व्यावहारिक और कानूनी
असर होते हैं:

  • पहचान का संकट: बिना वर्दी और बिना नेमप्लेट के आम नागरिक यह तय नहीं
    कर पाता कि सामने वाला व्यक्ति सच में पुलिसकर्मी है या भीड़ में शामिल कोई
    अराजक तत्व।
  • जवाबदेही से बचाव: अगर बल प्रयोग गलत तरीके से हुआ हो, तो पहचान न
    होने पर संबंधित अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई करना मुश्किल हो जाता है।
  • कानूनी वैधता पर सवाल: हिरासत में लेने, बल प्रयोग करने या किसी को
    गिरफ्तार करने के दौरान अगर अधिकारी अपनी पहचान नहीं बता पाता, तो वह
    कार्रवाई अदालत में चुनौती दी जा सकती है।
  • अफवाहों को बढ़ावा: पहचान स्पष्ट न होने पर सोशल मीडिया पर तरह-तरह के
    दावे और भ्रामक जानकारी तेजी से फैलती है, जैसा कि CJP प्रोटेस्ट में हनी
    डागर और यश कनावत की पहचान को लेकर हुआ।
  • भरोसे में कमी: जब सुरक्षाबल पारदर्शी तरीके से काम नहीं करते दिखते,
    तो आम जनता का पुलिस व्यवस्था पर भरोसा कमजोर होता है।

तो फिर सादे कपड़ों में पुलिस कब और कैसे तैनात हो सकती है?

जैसा कि शुरुआत में बताया गया, नियमों के मुताबिक जवाब हां में है — पुलिस और
सुरक्षाबल कुछ खास परिस्थितियों में सादे कपड़ों में तैनात हो सकते हैं, लेकिन
इसके लिए सख्त शर्तें और प्रोटोकॉल तय हैं:

  1. खुफिया और निगरानी कार्य: भीड़ में घुसकर संदिग्ध गतिविधियों पर नजर
    रखने, उपद्रवियों की पहचान करने या पहले से खुफिया जानकारी जुटाने के लिए
    सिविल ड्रेस टीमें तैनात की जा सकती हैं।
  2. वरिष्ठ अधिकारियों की मंजूरी: ऐसी तैनाती हमेशा वरिष्ठ अधिकारी के
    लिखित या दर्ज निर्देश पर होनी चाहिए, मनमाने ढंग से नहीं।
  3. बल प्रयोग की इजाजत नहीं: सिविल ड्रेस टीम का काम सूचना जुटाना और
    निगरानी करना है, सीधे लाठीचार्ज करना या भीड़ पर बल प्रयोग करना उनके दायरे
    में नहीं आता — यह काम वर्दीधारी बल का ही है।
  4. पहचान पत्र साथ रखना अनिवार्य: सिविल ड्रेस में भी पुलिसकर्मी को अपना
    पहचान पत्र साथ रखना होता है और मांगे जाने पर दिखाना होता है।
  5. वरिष्ठ अधिकारी की मौजूदगी: ऐसी टीमों का संचालन आमतौर पर किसी
    वर्दीधारी वरिष्ठ अधिकारी की निगरानी में होता है, ताकि जवाबदेही बनी रहे।

दूसरे शब्दों में कहें तो सिविल ड्रेस पुलिसिंग का मकसद निगरानी और सूचना
जुटाना है, न कि भीड़ पर सीधा बल प्रयोग करना। जंतर-मंतर में जो हुआ, अगर वहां
सादे कपड़ों वाले लोगों ने वाकई लाठियां चलाईं, तो यह तय SOP से हटकर की गई
कार्रवाई मानी जा रही है, जिसकी जांच की मांग उठ रही है।

सोशल मीडिया पर पहचान को लेकर दावे और उनकी सच्चाई

वायरल वीडियो में दिख रहे टीशर्ट पहने व्यक्तियों की पहचान को लेकर सोशल मीडिया
पर कई दावे किए गए। कुछ यूजर्स ने उन्हें दिल्ली पुलिस के जवान बताया, जबकि कुछ
ने दावा किया कि वे किसी राजनीतिक संगठन से जुड़े लोग हैं जिन्हें जानबूझकर
भीड़ में उतारा गया। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि अभी तक
सामने नहीं आई है। इसी अनिश्चितता ने पूरे मामले को और विवादित बना दिया, और
यही वजह है कि दिल्ली पुलिस मुख्यालय को सफाई के साथ-साथ नया आदेश भी जारी करना
पड़ा।

पाठकों के लिए यह समझना जरूरी है कि जब तक कोई आधिकारिक जांच रिपोर्ट या पुलिस
की पुष्टि नहीं आती, तब तक सोशल मीडिया पर चल रहे व्यक्तिगत पहचान के दावों को
अंतिम सच मान लेना उचित नहीं है।

दूसरे राज्यों में भी उठ चुका है ऐसा विवाद

यह पहली बार नहीं है जब प्रदर्शन या भीड़ नियंत्रण के दौरान सादे कपड़ों में
मौजूद व्यक्तियों को लेकर सवाल उठे हों। बीते कुछ वर्षों में अलग-अलग राज्यों
में छात्र आंदोलनों, किसान प्रदर्शनों और नागरिकता कानून विरोधी आंदोलनों के
दौरान भी इसी तरह की तस्वीरें और वीडियो सामने आते रहे हैं, जिनमें सिविल ड्रेस
में मौजूद लोग भीड़ के बीच सक्रिय दिखे। हर बार पुलिस प्रशासन की सफाई एक जैसी
रही है — कि ये लोग खुफिया या निगरानी टीम का हिस्सा थे। लेकिन जब यही लोग बल
प्रयोग करते या हिंसक कार्रवाई में शामिल होते नजर आते हैं, तो यह सफाई कानूनी
और नैतिक दोनों ही स्तर पर कमजोर पड़ जाती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की घटनाएं दोहराए जाने से पुलिस बल की छवि और
आम जनता के भरोसे पर सीधा असर पड़ता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रदर्शन
करने का अधिकार संविधान द्वारा दिया गया मौलिक अधिकार है, और इस अधिकार का
इस्तेमाल करने वाले नागरिकों के सामने अगर सुरक्षाबल अपनी पहचान छिपाकर आते
हैं, तो यह स्थिति संदेह और डर, दोनों को जन्म देती है। यही वजह है कि कानूनी
विशेषज्ञ और पूर्व पुलिस अधिकारी भी बार-बार यह सुझाव देते रहे हैं कि प्रदर्शन
स्थलों पर तैनात हर बल की पहचान स्पष्ट रूप से दिखनी चाहिए, चाहे वह वर्दीधारी
हो या किसी विशेष टीम का हिस्सा।

पत्रकारों और आम नागरिकों के लिए यह मामला क्यों अहम है?

CJP प्रोटेस्ट के दौरान सामने आई तस्वीरें सिर्फ एक राजनीतिक विवाद भर नहीं
हैं, बल्कि यह मामला हर उस नागरिक से जुड़ा है जो कभी किसी शांतिपूर्ण प्रदर्शन
का हिस्सा बनता है। अगर बल प्रयोग करने वाले व्यक्ति की पहचान स्पष्ट न हो, तो
पीड़ित शिकायत तक दर्ज नहीं करा पाता, क्योंकि उसे यह पता ही नहीं चलता कि उस
पर हमला करने वाला व्यक्ति कौन था और किस विभाग से जुड़ा था। यही कारण है कि
पत्रकार, मानवाधिकार कार्यकर्ता और कानूनी विशेषज्ञ इस मुद्दे को गंभीरता से
उठा रहे हैं, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पारदर्शी जांच हो सके और
जिम्मेदारी तय हो सके।


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निष्कर्ष: संतुलन जरूरी है

कानून व्यवस्था बनाए रखना पुलिस का संवैधानिक कर्तव्य है, और कई बार सुरक्षा
कारणों से सिविल ड्रेस में निगरानी टीमें तैनात करना जरूरी भी हो सकता है।
लेकिन यह छूट असीमित नहीं है। जब बात सीधे नागरिकों पर बल प्रयोग की आती है, तो
पारदर्शिता, पहचान और जवाबदेही किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद होती
है। CJP प्रोटेस्ट के दौरान जो तस्वीरें सामने आईं, वे इसी बुनियाद पर सवाल
खड़ा करती हैं — और यही वजह है कि इस मामले की निष्पक्ष जांच अब सिर्फ एक मांग
नहीं, बल्कि जनता के भरोसे को बहाल करने की जरूरत बन चुकी है।


अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

1. क्या भारत में पुलिस सादे कपड़ों में ड्यूटी कर सकती है?

हां, लेकिन सीमित मामलों में। CID, क्राइम ब्रांच और खुफिया टीमें निगरानी और
सूचना जुटाने के लिए सिविल ड्रेस में काम कर सकती हैं। आम भीड़ नियंत्रण या
बल प्रयोग वाली ड्यूटी वर्दीधारी पुलिस का ही काम है।

2. क्या सादे कपड़ों में पुलिसकर्मी लाठीचार्ज कर सकता है?

तय प्रोटोकॉल और SOP के मुताबिक, सीधे भीड़ पर बल प्रयोग या लाठीचार्ज करने
का काम वर्दीधारी बल को ही करना चाहिए, ताकि पहचान और जवाबदेही सुनिश्चित
रहे। सादे कपड़ों में बल प्रयोग को उल्लंघन माना जाता है।

3. CJP प्रोटेस्ट में सादे कपड़ों में दिखे लोग कौन थे?

सोशल मीडिया पर दो लोगों की पहचान हनी डागर और यश कनावत के रूप में की गई और
दावा किया गया कि वे दिल्ली पुलिस के जवान हैं। हालांकि इसकी स्वतंत्र
आधिकारिक पुष्टि अभी बाकी है।

4. दिल्ली पुलिस ने इस विवाद पर क्या कदम उठाया?

22 जुलाई को दिल्ली पुलिस मुख्यालय ने सभी यूनिट्स को निर्देश दिया कि
प्रदर्शन स्थल पर तैनात हर जवान अनिवार्य रूप से पूरी वर्दी में रहेगा।

5. BNSS की धारा 163 क्या है?

यह पुरानी CrPC धारा 144 का नया रूप है, जिसके तहत मजिस्ट्रेट या पुलिस
आयुक्त किसी क्षेत्र में भीड़ जमा होने, हथियार ले जाने या जुलूस पर अस्थायी
प्रतिबंध लगा सकते हैं।

6. अगर पुलिसकर्मी अपनी पहचान नहीं बताता तो क्या यह कानूनी रूप से गलत है?

कानूनी सिद्धांतों और कोर्ट की टिप्पणियों के मुताबिक, बल प्रयोग या हिरासत
में लेने से पहले पुलिसकर्मी की पहचान स्पष्ट होनी चाहिए। पहचान छुपाकर की गई
कार्रवाई कानूनी चुनौती के दायरे में आ सकती है। 

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