सदियों पहले, जब गुजरात की अंधेरी रातों में चाँदनी अपनी पूरी आभा बिखेरती थी, तब एक रहस्यमय ऊर्जा पूरे वातावरण को घेर लेती थी। यह सिर्फ एक नृत्य नहीं था, बल्कि शक्ति की पूजा का एक गूढ़ अनुष्ठान था। इस नृत्य की प्रत्येक मुद्रा में जीवन और मृत्यु का चक्र छिपा था, और इसके केंद्र में रखी छोटी-सी ‘गरबी’ में समाई थी सृष्टि की जननी। आज भी, जब ढोल की थाप हवा में गूँजती है, तो समय थम-सा जाता है और हर नर्तक एक प्राचीन परंपरा के धागे से जुड़…
